सोमवार, 17 अगस्त 2009

नानी

.एक अंतराल के बाद एक पोस्ट जो मेरी सखी के मन में बसी उनकी नानी की यादें हैं शायद आपको पसंद आए
गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' पति देव के होते हुए मुझे कम्प्युटर मिले मुश्किल लगता है।फ़िर भी ब्लागिंग का लोभ संवरण न कर सकी आज मौका मिलते ही पोस्ट दे रही आशा है आप सुधि जन पसंद करेंगें .....वैसे मैं कोई ..लेखिका नहीं ..हूँ ... मेरी एक सखी ने जो एक किस्सागोई में माहिर थी ने मुझे बताया एक वाक़या जो हूँ बहू उसी अंदाज़ में पेश है जैसा वो अभिव्यक्त करती थी :"उन दिनों का है जब हम नानी के गाँव जाया करते थे ओब्यसली उम्र होगी कोई 5 - 6 बरस की .... गाँव की लड़कियां जो मेरी उम्र की होतीं एक एक कर मेरे 10-12 होते होते ससुराल चलीं गई.... उन दिनों गाँव में बेटियों का 8-10 साल के बाद पिता के घर रुकना समाज का सर्वोच्च कठिन मामला होता था, ख़ुद बालिकाएं भी इसके लिए मानसिक रूप से तैयार रहतीं और तो और ससुराल जाने का इंतज़ार करतीं ..... सच सामाजिक संरचना कैसी थी तब नानी तो ख़ुद 7 बरस की उमर में बहू बन के आयीं थी । पर उनमे समाज की कुरीतियों से जूझने की अदम्य ताकत थी । नानी एक कम उम्र में हुई विधवा थीं । किंतु दृदता इतनी कि उस दौर के किसी पुरूष गृह-स्वामी से बीसी ही थीं उन्नीसी नहीं . दस एकड़ की बिन सिंची ज़मीन के लिए कुँआ उसमे रहट से सिचाई । और किसानों से ज़्यादा उपज नानी के खेत देते थे नानी की जमीन 10 से 25 एकड़ हो गई से इसका अंदाजा लगाना मुश्किल था। नानी का सिद्धांत था "न किसी बैल को कम चारा न किसी मज़दूर को कम मज़दूरी " नानी को समाज से तब बहिस्कृत किया गया जब उनने गुन्नू डोम की औरत की जान बचाई थी समाज के एक मुखिया ने जो नानी के प्रति बैर भाव रखते थे ने उनको ने उनको जात निकाला दे दिया । नानी ने पञ्च फैसले का सम्मान किया। समाज से किसी तरह का कोई समाज कोई पंगा नहीं लिया । न समाज से कोई बैर भाव न था नानी के मन में न ही मुखिया जी के लिए. बिन्दास अपना काम करतीं रही नानी को न उधौ से लेना न माधौ को कुछ देना था. एक रात कम उम्र में ब्याह के लाई गई मुखिया की बहू का डिलेवरी के दौरान दाई के हाथों जाने क्या हुआ बहू का इतना खून गिरा कि बहू अब गै कि तब............!
सबसे पहली महिला नानी थी जिसने मुखिया की बहू के लिए हरकारा भेज पास के कस्बे से डाक्टर को बुलवाया. उस जमाने में खून की जरूरत एक कठोर मिशन बन जाता था. नानी ने बगैर किसी की परवाह के बिना घर छोड कर उस बहू के साथ शहर के अस्पताल गई . अपना खून दिया बहू की जान तो बच गई किन्तु नानी नहीं लौटी ....... वहीं से तीर्थाट्न को निकली ....! जब लौटी नानी एक खबर की शक्ल में अब गांव ने तब जाना कि नानी एक महान औरत थी.


1 टिप्पणी:

  1. सच सामाजिक संरचना कैसी थी तब नानी तो ख़ुद 7 बरस की उमर में बहू बन के आयीं थी .saty hai.

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